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अन्बूझे से रह गए अनसुलझे से प्रश्न काल भंवर से हो गए मन के अंतर्द्वंद
कच्ची मिटटी में ढले रिश्ते यहाँ हज़ार कब टूटे कब जुड़ गए मन से मन के तार
मृग तृष्णा सी नीद हुयी बंजारों सा चैन पलकों में ही सूख गए अलास्भोर के स्वप्न
सावन भादों बैरी हो गए रस्ता भूला फाग वीरह जेठ ने सुखा दीए तरुण-प्रेम के ताल
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